तंत्र–मंत्र पर एक
तंत्र–मंत्र भारतीय आध्यात्मिक परंपरा का रहस्यमय, गहन और प्रभावशाली पक्ष है, जिसने सदियों से साधकों, संतों और जिज्ञासुओं को अपनी ओर आकर्षित किया है। यह केवल चमत्कार या अलौकिक शक्तियों की खोज नहीं, बल्कि मानव चेतना के विस्तार और आत्म-परिवर्तन का विज्ञान है। तंत्र जीवन को नकारता नहीं, बल्कि उसे स्वीकार कर उसकी ऊर्जा को साधना में रूपांतरित करता है।
तंत्र का अर्थ है—
विस्तार। यह मन, शरीर और आत्मा—तीनों के संतुलन से जुड़ा मार्ग है। इसमें ध्यान, योग, मुद्रा, यंत्र, न्यास और पूजा-विधान के माध्यम से साधक अपने भीतर छिपी शक्तियों को जाग्रत करता है। तंत्र कहता है कि जिस ऊर्जा से संसार चलता है, वही ऊर्जा साधक के भीतर भी प्रवाहित होती है—आवश्यक है उसे सही दिशा देना।
मंत्र तंत्र का प्राण है।
मंत्र ध्वनि की वह सूक्ष्म शक्ति है जो मन को एकाग्र करती है और चेतना को ऊँचे स्तर तक ले जाती है। बीज-मंत्र जैसे ॐ, ह्रीं, क्लीं आदि केवल शब्द नहीं, बल्कि कंपन हैं, जो सही उच्चारण, भावना और अनुशासन से साधक के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाते हैं।
तंत्र–मंत्र का उद्देश्य
भय पैदा करना नहीं, बल्कि भय से मुक्ति दिलाना है। लोकमान्यताओं में इसे अक्सर गलत समझा गया—काला जादू या नकारात्मक क्रियाओं से जोड़ दिया गया। जबकि वास्तविक तंत्र साधना शुद्ध आचरण, गुरु-दीक्षा और आत्मसंयम पर आधारित होती है। शैव, शाक्त और वैष्णव तंत्र—तीनों ही करुणा, अनुशासन और जागरूकता की शिक्षा देते हैं।
आज के तनावपूर्ण जीवन में तंत्र–मंत्र मानसिक शांति, आत्मविश्वास और संतुलन का मार्ग दिखाता है। यह हमें भीतर की शक्ति से परिचित कराता है और सिखाता है कि बाहरी संसार बदलने से पहले अंतरात्मा का रूपांतरण आवश्यक है।
निष्कर्षतः,
तंत्र–मंत्र कोई डरावना रहस्य नहीं, बल्कि आत्म-ज्ञान का आकर्षक और वैज्ञानिक मार्ग है। सही समझ और मार्गदर्शन में यह जीवन को सार्थक, संतुलित और ऊर्जावान बना सकता है।