तंत्र–मंत्र पर एक पृष्ठ
तंत्र–मंत्र भारतीय आध्यात्मिक परंपरा का एक प्राचीन और गूढ़ पक्ष है। सामान्यतः तंत्र और मंत्र को रहस्यमय, भयावह या केवल चमत्कारों से जोड़कर देखा जाता है, जबकि वास्तव में यह साधना, अनुशासन और आत्मिक उन्नति की एक विशिष्ट विधा है। वेद, उपनिषद, आगम और पुराणों में तंत्र–मंत्र के अनेक संकेत मिलते हैं। शैव, शाक्त और बौद्ध परंपराओं में तंत्र का विशेष स्थान रहा है।
तंत्र का अर्थ और स्वरूप
‘तंत्र’ शब्द संस्कृत की “तन” धातु से बना है, जिसका अर्थ है—विस्तार करना, संरचना देना या प्रणाली विकसित करना। तंत्र का आशय ऐसी साधना-पद्धति से है, जो शरीर, मन और चेतना—तीनों को साधन मानकर मोक्ष या सिद्धि की ओर ले जाती है। तंत्र में प्रकृति (शक्ति) और पुरुष (शिव) के संतुलन पर बल दिया जाता है। इसमें योग, ध्यान, मुद्रा, न्यास, यंत्र और अनुष्ठान सम्मिलित होते हैं।
मंत्र का अर्थ और महत्व
‘मंत्र’ शब्द “मन” (चित्त) और “त्र” (रक्षा) से मिलकर बना है—अर्थात जो मन की रक्षा करे। मंत्र विशिष्ट ध्वनियों और अक्षरों का संयोजन होते हैं, जिनका उच्चारण निश्चित विधि और भाव से किया जाए तो वे साधक के मन पर गहरा प्रभाव डालते हैं। मंत्र जप से एकाग्रता बढ़ती है, नकारात्मकता कम होती है और साधक की चेतना सूक्ष्म स्तर पर परिवर्तित होती है। गायत्री मंत्र, महामृत्युंजय मंत्र, बीज मंत्र आदि इसके उदाहरण हैं।
तंत्र–मंत्र का उद्देश्य
तंत्र–मंत्र का मूल उद्देश्य आत्म-साक्षात्कार, मानसिक शुद्धि और आध्यात्मिक विकास है। लोक-परंपराओं में इन्हें रोग निवारण, भय शमन, बाधा दूर करने या मनोकामना पूर्ति से जोड़ा गया, किंतु शास्त्रीय दृष्टि से इनका लक्ष्य साधक को अनुशासित, करुणामय और जागरूक बनाना है। तंत्र में नैतिकता, गुरु-दीक्षा और नियमों का विशेष महत्व है।
गुरु और अनुशासन की भूमिका
तंत्र–मंत्र साधना बिना योग्य गुरु के करना उचित नहीं माना जाता। गुरु साधक को सही मार्ग, विधि और सीमाएँ बताते हैं। अनुशासन, शुद्ध आहार-विहार, ब्रह्मचर्य (संयम), सत्य और अहिंसा जैसी मर्यादाएँ तंत्र साधना की आधारशिला हैं। बिना अनुशासन के किया गया प्रयोग भ्रम या हानि का कारण बन सकता है।
आधुनिक संदर्भ
आज के समय में तंत्र–मंत्र को अंधविश्वास से अलग कर समझना आवश्यक है। ध्यान, मंत्र-जप और योग जैसी तांत्रिक विधियाँ मानसिक स्वास्थ्य, तनाव प्रबंधन और आत्मिक शांति में सहायक सिद्ध हो रही हैं। वैज्ञानिक दृष्टि से ध्वनि, लय और ध्यान के मनोवैज्ञानिक प्रभावों पर भी अध्ययन हो रहे हैं।
निष्कर्ष
तंत्र–मंत्र कोई भय या चमत्कार की वस्तु नहीं, बल्कि आत्म-विकास की एक प्राचीन वैज्ञानिक साधना है। सही समझ, श्रद्धा, गुरु मार्गदर्शन और नैतिक अनुशासन के साथ यह साधक के जीवन में संतुलन, शांति और चेतना का विस्तार कर सकती है।
–kamta prasad